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द्वितीय प्रकरण / श्लोक 1-12 / मृदुल कीर्ति

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बोधस्वरूपी मैं निरंजन , शांत प्रकृति से परे,
ठगित मोह से काल इतने , व्यर्थ संसृति में करे.----१

ज्यों देह देही से प्रकाशित, जगत भी ज्योतित तथा,
या तो जगत सम्पूर्ण या कुछ भी नहीं मेरा यथा .----२

इस देह में ही विदेह जग से त्याग वृति आ गई
आश्चर्य ! कि पृथकत्व भाव से ब्रह्म दृष्टि भा गई ----३

ज्यों फेन और तरंग में , जल से न कोई भिन्नता,
त्यों विश्व ,आत्मा से सृजित , तद्रूप एक अभिन्नता ----४

ज्यों तंतुओं से वस्त्र निर्मित, तन्तु ही तो मूल हैं.
त्यों आत्मा रूपी तंतुओं से, सृजित विश्व समूल हैं.----५

ज्यों शर्करा गन्ने के रस से ही विनिर्मित व्याप्त है,
त्यों आत्मा में ही विश्व , विश्व में आत्मा भी व्याप्त है.----६

संसार भासित हो रहा, बिन आत्मा के ज्ञान से,
ज्यों सर्प भासित हो रहा हा,रज्जू के अज्ञान से.----७

ज्योतिर्मयी मेरा रूप मैं, उससे पृथक किंचित नहीं ,
जग आत्मा की ज्योति से ,ज्योतित निमिष वंचित नहीं ----८

अज्ञान- से ही जगत कल्पित , भासता मुझमें अहे,
रज्जू में ,अहि सीपी में चांदी , रवि किरण में जल रहे .-----९

माटी में घट जल में लहर , लय स्वर्ण भूषन में रहे ,
वैसे जगत मुझसे सृजित , मुझमें विलय कण कण अहे.----१०

ब्रह्मा से ले पर्यंत तृण, जग शेष हो तब भी मेरा,
अस्तित्व, अक्षय , नित्य, विस्मय, नमन हो मुझको मेरा.---११

मैं देहधारी हूँ, तथापि अद्वैत हूँ, विस्मय अहे,
आवागमन से हीन जग को व्याप्त कर स्थित महे.-----१२