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धत् तेरे की! / रमेश तैलंग

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धत् तेरे की ! अपनी किस्मत में
बोतल का दूध लिखा है।

मैं जो जरा बड़ा हो जाता,
और दाँत मेरे आ जाते।
फिर घर वाले मुझे छोड़कर
माल अकेले नहीं उड़ाते।
मगर अभी तो पलने के ही
अंदर अपना पाँव टिका है।

नूडल बना-बनाकर गुड़िया
सारे दिन खाती रहती है।
और एक दिन न खा पाए
तो मुँह बिचकाती रहती है।
गुड़िया के सिर पर भी देखो
क्या खाने का भूत चढ़ा है।

चलो, इशारों से ही तुमको
एक राज की बात बताऊँ।
अगर चले बस मेरा तो ये
चाट-पकौड़े सब खा जाऊँ
पर मम्मी को मेरा चट्टू
चेहरा अब तक कहाँ दिखा है?
धत् तेरे की ! अपनी किस्मत में
बोतल का दूध लिखा है।