भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

धनकटनी / प्रदीप प्रभात

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भोरै उठै छै मजूर-किसान
शीत सेॅ भरलोॅ अड्डा पेॅ चलै छै
गोड़ ससरी-ससरी जाय छै
फुलिया, बटुलिया आरो गंगिया भी छै साथें
हाथोॅ मेॅ पानी सेॅ भरलोॅ बाल्टी
फुलिया के हाथोॅ मेॅ छै
बटुलिया के मांथा पेॅ टिन्हलोॅ खिंचड़ी रोॅ हाड़ी
गंगिया के हाथोॅ मेॅ पाँच कचिया, धान कांटै के औजार।
गंगिया रहि-रहि अड्डा पर सेॅ ससरि-ससरि गिरै छै
हाँसें लागै छै फुलिया, बटुलिया सब्भें एककेॅ साथ।
आगू-आगू बाबु आरेा सब्भैं रोॅ पीछु माय
सब रोॅ ख्याल करतें जाय रहलोॅ छै बहियार।
मांय कहै छै सम्हरी-सम्हरी केॅ चलें अड्डा पर
शीतोॅ सेॅ भरलोॅ छै अड्डा रोॅ धोॅस।
फुलिया के बाल्टी रोॅ पानी छपकी-छपकी गिरै छै
मांय कहै छै पानी गिरै छौं कलें-कलें चल्लोॅ कर
पानी सब्भेॅ गिरि जैसौं तेॅ पीवै की?
फुलिया कहै छै हमरा सें तेॅ पानियें नी गिरतैं
पानी फिरू लानी लेबै। मतर कि जोॅ
बटुलिया मांथा पर राखलोॅ खिचड़ी के हड़िया
गिरि जैतौं तेॅ खैबै कि हमरोॅ माथोॅ?
ई सुनी सब्भेॅ ठठाय केॅ हाँसि पड़लै आरो
बटुलिया के मांथा पर राखलोॅ खिचड़ी भरलोॅ हड़िया
धड़ाम सेॅ धरती पर गिरि पड़लै
खिचड़ी धानों के खेतोॅ रोॅ फटोरी मेॅ जाय समैलै
जे धरती मुँह वाही केॅ ताकी रहलोॅ छेलै सरंगोॅ केॅ
ढेर दिनों सेॅ भुखली-पियासली।
ई खिचड़ी धरती माय के पेटों मेॅ चल्लोॅ गेलै।
सब्भैं रोॅ आँखी मेॅ निराशा रोॅ भाव थिरकी उठलै
सबरोॅ हँसी क्रंदन मेॅ बदली गेलै
धान कि काटतै सब जीव दिनभर भुखलोॅ रहलै
पेट रोॅ आगिन बुझाय लेली
जे खिचड़ी छेलै सब्भैं के यार।