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धरती के नाम एक शोकगीत / ओएनवी कुरुप

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हे धरती ! तेरी मृत्यु अभी नहीं हुई
तेरी आसन्न मृत्यु पर
तूझे आत्मशांति मिले !
तेरी और मेरी भी होनेवाली मृत्यु के लिए
मै यह गीत अभी से लिख रहा हूँ

मृत्यु के काले फूल खिले हैं
उसके साए में तू कल मर जाए
तेरी चिता जलाकर रोने के लिए
यहाँ कोई नहीं बचेगा
मैं भी !
यह गीत मैं तेरे लिए लिख रहा हूँ
हे धरती ! तेरी मृत्यु अभी नही हुई है
तेरी आसन्न मृत्यु पर
तेरी आत्मा को शांति मिले

प्रसव की पीड़ा सह
तूने बच्चों को जन्म दिया
अब ये आपस में लड़ते-झगड़ते हैं
वे एक दूसरे को मारते-खाते हैं
दूसरों से छिपकर तू रोती है
फिर थोड़ा-थोड़ा करके
वे तुझे भी खाते हैं
वे उछल-कूद मचाते हैं
वे शोर मचाते हैं
तब भी उन्हें रोके बगैर
तू सब कुछ सहती है
उनके साथ खड़ी रहती है !

अपनी हरी मृदुल कमीज़ पहनकर
तूने उन्हें स्तन-पान कराया
पर तेरा दूध पीकर बड़े हुए जो
वे तेरा पवित्र रक्त पीना चाहते हैं
बहुत प्यास लगी है उनको

तू वधू-सी प्यारी है
सूरज ने तुझे जो कपड़े पहनाए
उन्हें चीर-फाड़कर
तेरे नग्न शरीर को अपने नाखूनों से काट कर
उन घावों से निकले ख़ून को पीकर
उन्माद-नृत्य करनेवालों की हुंकारों से
मुखरित हो उठती है
मृत्यु की ताल !

अनजाने में युवक की
अपनी ही माँ से
शादी करने की कहानी[1]
पुरानी हो गई
आज धरती की ये संतानें
नई कहानियाँ रच रही हैं

धरती के वस्त्र उतारकर,
उन्हें हाट में बेचकर
वे मदिरा पान कर रही हैं
कुठारों का खेल जारी हैं !
सूरज की आँखों में
भभक उठता है गुस्सा

मेघों का झुंड पानी ढूँढ़ रहा हैं
श्रावण नन्हें फूल खोज रहा है
नदियाँ अपना प्रवाह तलाश रही हैं
सारा संतुलन बिगड़ गया है
जीवन का रथ-चक्र नाले में धॅंस गया है
जब तक मेरी चेतना में
थोड़ी-सी ज्योत्स्ना रह जाए
तब तक तुझ में जन्म ले
तेरा ही हिस्सा बनने की
स्मृतियाँ मुझमें जीवित रहेंगी !

तू मेरी जीभ पर मधु और वचा
लेकर आती पहली अनुभूति है
तू मेरे प्राणों के बुझते पल में
तीर्थ कण बन विलीन होती
अंतिम अनुभूति है

तुझमें उगती दूबों की कोरों में
ढुलकते तुहिन-कणों में भी
प्रकट होते नन्हें सूरज को देखकर
मेरे दिल में विस्मयित सवेरा
उदित हुआ है !
तेरे पेड़ों की छाँव में
हमेशा मेरी कामना गाएँ चरती हैं
तेरे समुंदर से होकर
प्रवाचक के आगमन-सी
हवा चल रही हैं

सब कुछ मुझे मालूम है
हज़ारों नन्हे बच्चों के लिए
पालना और लोरी संजोकर
तेरा जागना
हज़ारों ग्रामीण आराधनालयों में
झूला डालना
पीपल के पत्तों के छोर पर नाचना
पंचदल फूल बन इशारा देना
मंदिर का कबूतर बन
कुर-कुर रव करना
हज़ारों नदियों की लहर बनकर
आत्महर्ष के सुरों में सुर मिलाना
शिरीष, कनेर और बकुल बन
नए रंग-बिरंगे छातों को फहराना
घुग्घु का घुघुआना बन
सबको डराना
कोयल की आवाज़ बनकर
सबका डर दूर करना
अंतरंगों की रंगोलियों में
रंग भरने सौ वर्णों की मंजुषाएँ
संजोकर रखना

शाम को साँझ से
सुनहला बनाना
संध्या को लेकर वन की ओर
ओझल हो जाना
फिर उषा को कंधों पर लादना
मुझे जगाने
मुझे पीयूष पिलाने के लिए
वन के दिल के घर में
अंडे सेकर कविता को प्रस्फुटित करना
जलबिंदु-सा तरल
मेरे जीवन को
कमलदल बन आश्रय देना
तेरे इन कामों से मैं परिचित हूँ

तू मुझमें समा जाती है
तेरी स्मृतियाँ ही
मेरे लिए पीयूष धारा है !

हे हंस
तुम पंखों से
संगीत भरते हो
तेरे नन्हें पंखों की नोक पर
क्षण-भर के लिए
क्षण-भर के लिए ही सही
मेरे जीवन का मधुर सत्य
प्रज्जवलित हो उठता है !
यह बुझ जाए!

तू अमृत है
जिसे मृत्यु के बलि के कौए ने चुगा
मुंडित सिर से, भ्रष्ट बन
तू जब सौरमंडल के राजपथ
से होकर
बच्चों के पाप के मैले वस्त्रों की
गठरी ढोकर
अधसूने दिल में दहकनेवाली
पीड़ाओं की ज्वाला बन
चली जाती है
ऐसे में
तेरे शिराओं से
कहीं छन-छनकर तो नहीं आ रही
कराल-मृत्यु


हे धरती तेरी मृत्यु अभी नहीं
हुई है
लेकिन यह तेरी मृत्यु का
शोकगीत है !
तेरी और मेरी भी होनेवाली मृत्यु
का यह गीत
मैं अभी से लिख रहा हूँ

तेरी चिता जलाकर रोने के लिए
मैं यहाँ बचा नहीं रहूँगा
इसलिए बस इतना ही
उल्लेख कर रहा हूँ
हे धरती तेरी मृत्यु अभी
नहीं हुई है !
तेरी आसन्न मृत्यु पर
तेरी आत्मा को शांति मिले
तुझे आत्मशांति मिले !

मूल मलयालम से अनुवाद : संतोष अलेक्स

शब्दार्थ
  1. इडिपस की कहानी