भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
धरती से दूर हैं न क़रीब आसमाँ से हम / रऊफ़ खैर
Kavita Kosh से
धरती से दूर हैं न क़रीब आसमाँ से हम
कूफ़े का हाल देख रहे हैं जहाँ से हम
हिन्दोस्तान हम से है ये भी दुरूस्त है
ये भी ग़लत नहीं कि हैं हिन्दोस्ताँ से हम
रक्खा है बे-नियाज़ उसी बे-नियाज़ ने
वाबस्ता ही नहीं हैं किसी आस्ताँ से हम
रखता नहीं है कोई शहादत का हौसला
उस के ख़िलाफ लाएँ गवाही कहाँ से हम
महफ़िल में उस ने हाथ पकड़ कर बिठा लिया
उठने लगे थे एक ज़रा दरमियाँ से हम
हद जिस जगह हो ख़त्म हरीफ़ान-ए-‘ख़ैर’ की
वल्लाह शुरू होते हैं अक्सर वहाँ से हम