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धीरे-धीरे जाग रहे हैं अब मेरी बस्ती के लोग / एन. सिंह

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धीरे-धीरे जाग रहे हैं अब मेरी बस्ती के लोग
रामराज झूठा सपना था, जान गये बस्ती के लोग

बेईमान तो लूट रहे, कुछ ईमानदार बनकर छलते
एक हैं दोनों, समझ गये हैं, अब मेरी बस्ती के लोग

चाहें इसकी हो या उसकी, मार-मार ही होती है
नहीं सहेंगे, वार करेंगे अब मेरी बस्ती के लोग

कमज़ोर हाथ में आ जाने से, लाठी भी ताक़त खोती है
अपनी ग़लती जान रहे हैं, अब मेरी बस्ती के लोग

शान्ति-वन से राजघाट तक, हर रंग के क़स्मे-वादे हैं
झूठ-सत्य में भेद समझते, अब मेरी बस्ती के लोग