भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

धीरे-धीरे सूख रही है तुलसी आँगन में / योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

धीरे-धीरे सूख रही है
तुलसी आँगन में

पछुवा चली शहर से, पहुँची
गाँवों में घर-घर
एक अजब सन्नाटा पसरा
फिर चौपालों पर

मिट्टी से जुड़कर बतियाना
रहा न जन-जन में

स्वांग, रासलीला, नौटंकी,
नट के वो करतब
एक-एक कर हुए गाँव से
आज सभी गायब

कहाँ जा रहे हैं हम, ननुआ
सोच रहा मन में

नये आधुनिक परिवर्तन ने
ऐसा भ्रमित किया
जीन्स टॉप में नई बहू ने
सबको चकित किया

छुटकी भी घूमा करती नित
नूतन फ़ैशन में