धुंआ-सा है जो ये आकाश के किनारे पर / नासिर काज़मी

धुंआ-सा है जो ये आकाश के किनारे पर
लगी है आग कहीं रात से किनारे पर

ये काले कोस की पुरहौल रात है साथी
कहीं अमां न मिलेगी तुझे किनारे पर

सदाएं आती हैं उजड़े हुए जंज़िरों से
कि आज रात न कोई रहे किनारे पर

यहां तक आये हैं छींटे लहू की बारिश के
वो रन पड़ा है कहीं दूसरे किनारे पर

ये ढूंढता है किसे चांद सब्ज़ झीलों में
पुकारती है हवा अब किसे किनारे पर

इस इंक़लाब की शायद ख़बर न थी उनको
जो नाव बांध के सोते रहे किनारे पर

हैं घाट में अभी कुछ क़ाफ़िले लुटेरों के
अभी जमाये रहो मोर्चे किनारे पर

बिछड़ गये थे जो तूफां की रात में 'नासिर'
सुना है उनमें से कुछ आ मिले किनारे पर।

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