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धूल में मिल रही शराफ़त / विनय मिश्र

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धूल में मिल रही शराफ़त है ।
ये नए दौर की सियासत है ।

और होगा वो ज़माना सच का,
आज कल झूठ की इबादत है ।

आपसे हमने अपना हक़ माँगा
आप कहते हैं यह बग़ावत है ।

फ़ैसले मुजरिमों के हक़ में हैं
कठघरे में खड़ी अदालत है ।

मर्द-ए-मैदाँ है मेरा ग़म मुझमें
उसको मुझसे भी अब अदावत है ।

चीख़ सकती है ख़ामोशी मेरी
क्या कहूँ बोबानी आदत है ।

आइए ख़ुद में झाँककर देखें
अपनी पहचान की ज़रूरत है ।