(राग भैरवी-ताल कहरवा)
नंद-नँदन श्रीकृष्ण एक ही हैं सब रूपों के आधार।
वे ही सकल रसोंके, वे ही सकल सुखोंके भी आधार॥
चिन्तन उनका सुखमय, सुखमय हैं उनके मंगल-दर्शन।
अन्ग-स्पर्श परम सुखमय है, उनका सब कुछ ही कर्षन॥
आत्मरूपमें तन-मनमें नित मिले हुए हैं वे प्रियतम।
वे ही नित अनुभवमें आते, छटा दिखाते शुचि अनुपम॥
भरे रहें रस-रूप-सौख्यमय प्रिय वे मम बाह्यस्नयंतर।
उनकी रतिमें हँसता-रोता, रहे नाचता नित अन्तर॥