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नई सुबह की सुधि में / लाला जगदलपुरी

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नींद के गाँव एक सपन जागा,
प्रतिध्वनित सूनापन जागा ।

गंध पी-पी रजनीगंधा की,
मदिर-मदिर मधुर पवन जागा ।

कुटीर सोया खुर्राटों में,
परंतु निर्दयी भवन जागा ।

स्वयं परिचित नहीं स्वयं से ही,
अविस्मरणीय विस्मरण जागा ।

रात भर नई सुबह की सुधि में,
दीपक बार कर गगन जागा ।