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नएपन से मैं कुछ घबरा उठा था / कांतिमोहन 'सोज़'

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नएपन से मैं कुछ घबरा उठा था ।
पुराना कुछ न था वां सब नया था ।।

न रस्सी थी न थी ज़ंजीर कोई,
मगर कुछ था कि मुझको बाँधता था ।

उस एक लम्हे ने जादू कर दिया था,
सख़ी था वो न मैं कुछ चाहता था ।

बरसते थे जिलौ के ताज़ियाने,
अन्धेरा पागलों-सा हँस रहा था ।

ग़मे-दुनिया की परवा ही किसे थी,
फ़ज़ाओं में शहद-सा घुल चला था ।

हटा पर्दा तो बेपर्दा हुई वो,
सचाई क्या थी मैं क्या सोचता था ।

बड़े काम आई तेरी कज-अदाई,
वगरना सोज़ से अब क्या छुपा था ।।