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नगर भमिए भमि ऐलअ भोला महादेव / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

शिव द्वारा अपनी साली से ही दूसरा विवाह कर लेने पर गौरी के रुष्ट होने और सौत के संतानहीन होने का शाप देने का उल्लेख इस गीत में हुआ है। संध्या का, जो सौत बनकर आई है, यह कहना कितना मार्मिक है- ‘बहन, भला-बुरा क्यों कहती हो तथा शाप क्यों देती हो? मेरे लिए तो कार्तिकेय और गणपति दो बालक हैं, उनको मैं खेलाऊँगी।’ सौत का नाम सुनते ही गौरी का खिन्न हो जाना स्वाभाविक है।

नगर भमिए[1] भमि ऐलअ भोला महादेव, बैसी गेलअ आपन दुआर हे।
एक हाथे लेले गौरा सिबजी के आसन, दोसर हाथे लोटा भरि जल हे॥1॥
पाँव धुअ[2] सिब आसन चढ़ि बैसअ, कहु सिब नैहरा कूसल हे।
नैहरा कुसल गौरा देसो कुसल, कुसल जे कुल परिबार हे।
एक जे कुसल गौरी कहलो न जाइछै, सिब कैल दोसरो बिहाय हे॥2॥
किए हमैं आँहे सिब चोरनी चाटनी[3], किए तोर मुसल्हाँ[4] भंडार हे।
किए हमैं आँहे सिब, सेबा में चुकल्हाँ[5], कथि लाइ कैल्हा सिब दोसर बिहाय हे॥3॥
नहिं तहुँ आँहे गौरा चारनी चाटनी, नहिं तहुँ मुसल्हाँ भंडार हे।
नहिं तहुँ आँहे गौरा सेबा में चुकल्हे, बैसेहि[6] सिब कैलन दोसरो बिहाय हे॥4॥
बिहाय कैल्हा सिव भल काम हे कैलाह, बाढ़ियौ जे तोहरो बंस हे।
आहो रे तिरिया कौने रूप छै, सेहो मोरा देहो बतलाय हे॥5॥
तोहरो ऐसन गौरा आँगहोक[7] पातरि, फुलवा ऐसन सुकुँवार हे।
बतिसो जे दाँत हुनकॉे बिजुली छटकै, संझा छै हुनकॉे नाम हे॥6॥
मरियो गे संझा भाइ रे भतिजवा, आरो होइहो कोखिया बिनास हे।
तीनि भुवन बर कतहुँ न मिललौ, भै गेलै सौतनी हमार हे।
आँरे तीनि भुवन बर कतहुँ न मिललौ, बर कैले तपसी भिखार हे॥7॥
मतु पढ़अ गारी गौरा, भाइ रे भतीजा लाइ, जनि करिहऽ कोखिया बिनास हे।
कारतिक गनपति, दोइ रे बालक, गोदी के खेलाइबअ होइबअ में दासी तोहार हे॥8॥

शब्दार्थ
  1. घूम-फिरकर; भ्रमण करके
  2. धोइए
  3. चटोर; पतली जीभवाली
  4. चुराया
  5. गलती की; चूक गई
  6. वैसे ही
  7. अंग की