भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

नज़र आती नहीं मंज़िल तड़पने से भी क्या हासिल / रविन्द्र जैन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

नज़र आती नहीं मंज़िल, तड़पने से भी क्या हासिल
तक़दीर में ऐ मेरे दिल, अंधेरे ही अंधेरे हैं

मजबूरी ने जिसको मारा, उसका कौन सहारा
मांझी तो मिल जाते हैं पर मिलता नहीं किनारा

नैनों से यूँ छिन गई ज्योती सीप से जैसे मोती
एक जान और सौ दुश्मन हैं, काश ये जान न होती