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नज़र से खुद को मैं अपनी गिरा नहीं सकती / सिया सचदेव

नज़र से खुद को मैं अपनी गिरा नहीं सकती
कभी हद्दों से तो बाहर मैं आ नहीं सकती

मेरे वजूद में तहज़ीब साँस लेती है
जदीद तर्ज़ पे खुद को गँवा नहीं सकती

किसी ने शहर में अफ़वाह ये उड़ा दी है
चराग़ लेके मैं आँधी में जा नहीं सकती

किये है तूने जो एहसान बारहा मुझ पर
ये क़र्ज़ मर के भी तेरा चुका नहीं सकती

वो एक दिल मैं जिसे आइना समझती हूँ
मैं उसके सामने चेहरा छुपा नहीं सकती

तेरे फ़रेब ने मोहतात कर दिया मुझको
मैं दिल पे और नए ज़ख्म खा नहीं सकती

अजीब लोग है अपनी ग़रज़ से मिलते हैं
सिया मैं उनसे ताल्लुक़ निभा नहीं सकती