नदी / अजित सिंह तोमर

नदी
कहती है पहाड़ से
कभी मिलने आओ
और पहाड़ रो पड़ता है
नदी समझती है बोझ का दर्द
इसलिए फिर नही कहती कुछ
केवल समन्दर जानता है
नदी के आंसूओं का खारापन
क्योंकि
उसके लिए वो बदनाम है
नदी कृतज्ञ है
अंतिम आश्रय के लिए
पहाड़ शर्मिंदा है
प्रथम उच्चाटन के लिए
समन्दर शापित है
चुप रहनें के लिए
नदी पहाड़ समन्दर
एक दूसरे की कभी शिकायत नही करतें
बस देखतें हैं चुपचाप
मजबूरियों का पहाड़ होना
आँसूओं का नदी होना
धैर्य का समन्दर होना।

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