भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

नर्तकी / स्वरांगी साने

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वन्दन करते हुए
आएगी नर्तकी
उसके बाद करेगी आमद
ठीक समय पर पढ़ेगी बोलों को
निभाएगी मात्राओं में
वो बेताली नहीं होगी
वो शब्दों के साथ चलेगी
तालबद्ध नाचेगी
उसकी भाव-भंगिमाएँ
कसक-मसक
सब होंगे अविश्वसनीय तरीके से सटीक

करेगी लयकारी
अँगुली के पोर से दिखाएगी हाव
आँखों की कोर से दिखाएगी भाव
उसका रियाज़
उसके नृत्य में दिखेगा साफ़-साफ
कितनी मात्रा के बाद गर्दन को कितना घुमाना है
यह उसे कण्ठस्थ होगा
वो भूलकर भी नहीं करेगी कोई गलती
बजते रहेंगे उसके घुँघरू
जब करेगी वो ठुमरी
तो उसके साथ
आप भी गुनगुनाएँगे
                      ‘हमरी अटरिया पर आओ बलमवा'

उसकी प्रस्तुति में हर वो बात होगी
जो आप चाहेंगे देखना
ठाह से शुरू कर
वो द्रुत तक पहुँचेगी
लय बढ़ेगी
चरम पर होगा उसका नर्तन
वह करेगी ताण्डव
करेगी लास्य
नटवरी करेगी
और शुद्ध नर्तन भी
आप चमत्कृत होंगे
वो हतप्रभ करेगी
तालियों की गड़गड़ाहट में
वो थमेगी सम पर
जाएगी विंग्स में
लौटेगी फिर से अपने अन्धेरे में।