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नहीं होती अँकुरित हरी कोपलें / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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यहाँ के मुक़ाबले
हरदम ही बेहतर लगता था गाँव का सब
लेकिन अब
लगता है संशयास्पद
आस-पास का माहौल
यह गाँव का ही बदला हुआ रूप है या
अपने ही मन का खेल
मुश्किल है यह तय कर पाना !

रास्ते में मिलता हर आदमी
अपनेपन से पूछता है कुशल-मंगल
जैसे
उसी के घर का कोई
शहर से छुट्टी पर आया हो
कैसे हैं सब, बीवी और बच्चे
कितनी है तनख़्वाह, पूछते हैं
और क्या ऊपर की भी है कोई कमाई !
पूछते हैं यह सब भोलेपन से
किसी को किसी का नही है कोई उधार चुकाना
फिर भी भीतर बहता रहता है प्रेम का झरना

मुम्बईवाले सहपाठी से अचानक कभी
मुलाक़ात हो जाती है घर जाने वाली रह पर
स्कूल वाले अबोध दिनों के साथ
रह-रहकर आती हैं
स्कूल की यादें..
हाफ़ पैण्ट पहने
एक ही लोटा लेकर दोनों जाते थे खेत में
दस पैसे का बर्फ़ गोला खाते आधा-आधा
आधी छुट्टी में होड़ लगाना कि
किसकी मूत जाती है सबसे दूर

सर पर तेल नहीं होता था
पैरों में चप्पल नहीं किसी के
रास्ते के किनारे-किनारे चलते
गर्मधूल से कहीं पैर न जल जाएँ इसलिए

बरसात में कमर तक पानी पहुँच जाने पर
बस्ता सर पर ले लेते
और चड्डी निकाल लेते नाला पार करते हुए
फिर एक दूसरे की ओर देखकर
हँसा करते, लगाते थे ठहाके

‘अब अपन सेट हो गए हैं’
मुम्बई वाला दोस्त अभिमान से कहता हैं
विरार में खोली ली है
हम दो, हमारे दो
दोनों को ही इंग्लिश मीडियम में डाला है
साला…अपने बच्चे कॉम्पिटिशन में पीछे न रह जाए

गाँव भी आ गया है अब
मोबाईल की रेंज में
कोने-दर-कोने बजती है
लेटेस्ट रिंगटोन्स
चालीस के ऊपर चेनल्स आ गए हैं टी० वी० पर
गाँववालों के जन्मदिन के इश्तिहार
झलकते हैं केबल पर
डिजिटल पोस्टर्स की होड़ दिखती है हर चौराहे पर

अब भी निर्मल ग्राम योजना को
नहीं लिया है गम्भीरता से
वह भी पूरी हो ही जाएगी समय के प्रवाह में
फ़िलहाल बड़े घरों की औरते करती है अन्धेरे का इन्तज़ार
लोटा भरा रखकर चबूतरे पर
आगे चलकर सभी को आदत डालनी होगी
पाखाने की चारदीवारी की !
थोड़ी तकलीफ़ होगी फिर
आदतानुसार हो जाएगा कोटा साफ़

मोबाइल है स्विच्ड आफ़
टी० वी० में मन नहीं लगता
घर में दिल नहीं लगता
दोस्त भी नहीं है कोई ख़ाली,
हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त हैं
चलिए, यह भी ठीक है

थोड़ा पहाड़ी पर टहल आएँ, मिल जाएगी उतनी ही साफ़-सुथरी हवा
रास्ते में पड़ा गोबर अतीत की याद दिलाता है
बटोरते थे कितना गोबर
सबसे बड़ा ढेर बनाने की होड़ में

गोबर के उपले बनाते थे खेत में
दादी को दिन भर लगाने पड़ते चक्कर
करती पोता-पोतियों के लाड़ आते-जाते
कहाँ से मिलती थी इतनी ऊर्जा
घर के ख़ातिर कुछ करने को
कहती थी दादी
जैसे राम के सेतु के लिए
गिलहरी की नन्ही से कोशिश....

यह खेत वैसा ही मजबूत है
बरगद का पेड़ फैल गया है छाँव के साथ
मन्दिर का जीर्णोद्धार हो गया है
नहर का पानी बह रहा है हर ओर
झूम रही है हरी-भरी फ़सल

कौन से पत्थर पर पड़ गया है अपना बीज?
भीतर से नहीं फूटती हरित कोपलें
कहाँ से कहाँ आ गए!

अब, सब कुछ पाकर भी नहीं मिलती
मुट्ठी भर उपले बनाने की ख़ुशी!

मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत