भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

नाँय माने मेरौ मनुआं / ब्रजभाषा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

मैं तो गोवर्धन कू जाउँ मेरी बीर नाँय माने मेरौ मनुआ॥
नाय मानैं मेरौ मनुआं, अरी वीर नाँय मानें मनुआं॥ मैं तौ.
नाँय चहिएँ मोय पार परौसिन, नाँय चहिएँ...
इकली-दुकली धाऊँ मेरी बीर॥ नाय मानें.
सात सेर की करूँ कढइया, सात सेर की...
अरी मैं तो पूरी-पुआ बनाऊँ मेरी वीर
नाँय मानें मेरौ मनुआं। मैं तौ.
टोसा बाँध बगल में राखूँ, टोसा बाँध...
अरी मैं तो मन आवे वहाँ खाऊँ मेरी वीर,
नाँय माने मेरौ मनुआं। मैं तौ.
सात कोस की दउँ परिक्रमा, सात कोस की...
अरी मैं तो मानसी गंगा नहाऊँ मेरी वीर,
नाँय माने मेरौ मनुआ। मैं तौ.
श्री गिरिराज पै दूध चढ़ाऊँ, श्री गिरिराज पै...
अरी बर्फी कौ भोग लगाऊँ मेरी वीर,
नाँय मानै मेरौ मनुआ॥ मैं तौ.