भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
नाख़ुदा बन के या ख़ुदा होकर / रविकांत अनमोल
Kavita Kosh से
नाख़ुदा बन के या ख़ुदा हो कर
अब मिलेगा वो जाने क्या हो कर
मैं तो मजबूर हूं कि इंसां हूं
तू है मजबूर क्यूं ख़ुदा हो कर
बोलने के हुनर की ताक़त को
जान पाओगे बे-सदा हो कर
ख़ुद को तुम क्यूं ख़ुदा समझते हो
मेरी कश्ती के नाख़ुदा हो कर
मैं हमेशा रहा हूं गर्दिश में
आब होकर कभी हवा हो कर
तुम ख़ुदा के लिए ठहर जाओ
क्या मिलेगा तुम्हें जुदा हो कर
तुझको हैरान करके रख दूंगा
मुझसे मिलना कभी मिरा हो कर