ना-अह्ल को मसनद से उठा क्यों न दिया जाए
यह तख़्त किसी रोज़ हिला क्यों न दिया जाए
मौक़ा है तो फिर क्यों नहीं ली जाएँ दुआएँ
मज़दूर का हक़ उसको दिला क्यों न दिया जाए
सुनते हैं कि उस शोख़ की यह राह गुज़र है
इस राह पे पलकों को बिछा क्यों न दिया जाए
ये लोग जो फुटपाथ पे ग़मगीन पड़े हैं
इन दर्द के मारों को हँसा क्यों न दिया जाए
जब और किसी दिल में मकीं हो गया वो शख़्स
उस शख़्स को फिर दिल से भुला क्यों न दिया जाए
लफ़्ज़ों को बरतने का हुनर जिससे मिला है
वो ज़ख़्म ज़माने को दिखा क्यों न दिया जाए