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निऊँ कह रही धौली गाय / हरियाणवी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

निऊँ कह रही धौली गाय, मेरी कोई सुनता नईं ।

मेरे कित गए सिरी भगवान, मैं दुख पाय रई ।

मेरा दूध पीवे संसार, घी से खायँ खिचड़ी,

मेरे पूत कमावें नाज मैंघे भा की रूई ।

मेरी दहीए सुखी संसार, जब भी मेरे गल पै छुरी!


भावार्थ

--'यूँ कह रही है सफ़ेद गाय, मेरी बात कोई नहीं सुनता । मेरा भगवान कहाँ चला गया है ? मैं यहाँ दुख पा

रही हूँ । यह सारी दुनिया मेरा दूध पीती है । मेरे दूध से बने घी को खिचड़ी में डाल कर खाती है । मेरे पुत्र (मेरे

बछड़े ) ही तो अनाज पैदा करते हैं । उन्हीं के परिश्रम से महंगे भाव में बिकने वाली रुई भी उगती है । मेरे दूध

से ही दही बनाकर खाता है यह संसार और सुखी रहता है । इसके बावजूद भी जब मैं बूढ़ी हो जाती हूँ तो छुरी मेरे

ही गले पर चलती है ।'