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निकाले खुल्द से आदम को जुग बीते जनम निकले / प्रेम भारद्वाज

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निकाले ख़ुल्द<ref>स्वर्ग</ref> से आदम को जुग बीते जनम निकले
हवस की क़ैद से से लेकिन न वो निकले न हम निकले

अना की खन्दकों से पार हो मैदाने हस्ती में<ref>अस्तित्व के मैदान में</ref>
ख़ुदी को कर बुलन्द इतना कि ख़ुद दस्ते-करम<ref>कृपा का हाथ</ref> निकले

मुरव्वत,<ref>लिहाज</ref> प्यार, नफ़रत, इन्क़िलाबी दौर, मज़हब हो
कि इस तन्ज़ीम<ref>संगठन</ref> की बुनियाद में अहले-कलम<ref>लेखक</ref> निकले

लड़ाई अज़्मतों<ref>प्रतिष्ठाओं</ref> की तब समुन्दर पार जा पहुँची
लखन रेखा मिटा कर जब सिया के दो क़दम निकले

सफ़र में लूट,डाके, चोरियाँ आसेब<ref>भूत-प्रेत</ref>, आवाज़ें
हक़ीक़त में तो ये सब रहनुमाँ के ही करम निकले

ख़ुशामद रात भर करके वो सुबह आँखें दिखाता है
कि रस्सी जल गई सालिम<ref>सारी</ref> न फिर भी उसके ख़म<ref>बल, वक्र </ref>निकले

हुए माशूक़, साहूकार माहिर सूदख़ोरी में
अदा कर दो वुजूद<ref>अस्तित्व</ref> अपना बक़ाया<ref>शेष</ref>ही रक़म निकले

किसे आख़िर बनाएँ राज़दाँ वो सब के सब अपने
दबाकर जीभ दाँतों के तले खाकर क़सम निकले

अधूरी प्रेमगाथा के लिए है क़ौल<ref>वचन</ref> ग़ालिब का
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

शब्दार्थ
<references/>