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निर्वेतन / पूनम मनु

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घिरी आँधी और काले बादलों का
भयंकर रूप देख
रूह काँप गई उसकी
ओह! बड़ियाँ, दालें, कपड़े
सभी तो छत पर पड़े हैं
काले बादलों से ज़्यादा तेजी थी आँधी में
और आँधी से तेज दौड़ते पाँव
एक भी बूंद टपकती या कि बड़ियाँ उड़ जातीं
उससे पहले ही सब समेट
लंबी-लंबी सांस भरती रही सरला ...

अचार की तैयारी करते
मौसम का बदलता मिजाज
न भाँप पाई थी वह

सब्जी ...उफ! सभी आते होंगे
जेठानी, देवरानी, चारों-पांचों घर के मरद और
पाँच पोते-पोतियों के संग सास भी
हे भगवान! दौड़ कर आई
फिर भी सब्जी लग ही गई तली में
हाय! ढक्कन हटाते हाथ वहीं से जला कमबखत
जहाँ पर छाला पड़ा था सवेरे कपड़े धोते
पोंछा भी तो बमुश्किल लगा सुबह
नाक-भों सिकोड़ खाना खाया जेठानी-देवरानी ने
पर हाथ उठ ही गया पति का
' नकारा सारा दिन घर में पड़ी खटिया तोड़ती है
भाभियों को देख, कितना कमाती हैं
और एक तू...
तुझसे खाना भी ठीक से नहीं बनता खाली पड़े'
बिना ये सोचे कि यदि
वह समय पर इनके सब काम न करे
तो कितना कमा सकते हैं ये लोग
रात के बर्तन मांझते सिसकती सोचती रही
पड़ोसन जिज्जी की नौकरानी भी
दो काम के दो हज़ार लेती है
मेरे काम के महीने में कितने बन जाते होंगे...?
काश! पूछ पाती वह किसी से
या कि बता पाता कोई कि
अनिच्छा से बनी
उस निर्वेतन कामगार की
पिछले पंद्रह साल से अब तक की
मजदूरी कितनी हुई होगी
और ये भी कि
उसकी मजदूरी देगा कौन।