नेम व्रत सजम के पींजरे परे को जब,
लाज-कुल-कानि-प्रतिबंधहिं निवारि चुकीं ।
कौन गुन गौरब कौ लंगर लगाबै जब,
सुधि बुधि ही कौ भार टेक करि टारि चुकीं ॥
जोग रतनाकर मैं सांस घूँटि बूड़े कौन,
ऊधौ हम सूधौ यह बानक विचारि चुकीं ।
मुक्ति-मुकता कौ मोल माल ही कहा है जब,
मोहन लला पै मन-मानिक ही वारि चुकीं ॥42॥