भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

नेह समन्दर / नीलम पारीक

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ओ मनङे रा मीत
नेह रो समन्दर तूँ
घूंट एक पाणी
मिल जावै जे इण तिरसे नै
के जासी तूँ रीत
ओ मनङे रा मीत
घड़ी स्यात
म्हारै सागै
दिल री धड़कन साँसा रा सुर
ढाळ जीवन री सरगम में
उकेरां कोई गीत
ओ मनङे रा मीत
पल पल लागै सदी सरीखो
सूखो सावण सूखो भादो
नेह रै मेंह नै ओ मन तरसे
मेघ नहीं बस नैणा बरसे
के अइयाँ ही बिन बरस्यां ही
रुत जावेली बीत
ओ मनङे रा मीत
ओ मनङे रा मीत