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नैणां भरल्यूं रंग / जितेन्द्र सोनी

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पौ फाट्यां
देखूं
पोलो ग्राउंड सूं
सूरज उग्यां तक लगोलग
भाखरां माथै बादळां रा रंग
भांत-भंतीला।
बदळै है छिण-छिण ऐ रंग
आपरो रूप,
जिकां में
म्हारी ओळख रै रंगां सूं अळगा
कीं नूंवां रंग,
ज्यां रो नीं जाणूं म्हैं नांव।
पण चावूं-
चुण-चुण भर लेवूं ऐ सगळा
नैणां मांय
अर जाय'र छिड़क द्यूं
म्हारै थार री माटी मांय,
अकाळ सूं जूझता घरां माथै,
किणी गरीब रै चूल्है रै असवाड़ै-पसवाड़ै
ओळूं मांय उदास दिलां री भींतां पर।
भर सक्यो जे ऐ रंग
तो नेहचो राखो
चटकै ही
बावड़ूंलो म्हैं आं रंगां साथै
पाछो आपणी माटी मांय।