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न्याय / बिष्णु महापात्र

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दिन बीतते जाते हैं
लेकिन कम नहीं होता वक़्त का ज़ुल्म
विस्तरित होता है विश्व
फैलती चली जाती है आकाश गंगा
लेकिन क्रूरता का जोई इलाज नहीं

जागता पड़ा हूँ मैं
एक नीम बेहोश टिमटिमाते अंधेरे में
शाश्वत चैतन्य पहरेदार कोई मेरे भीतर
दसों दिशाओं में बैठे दसों दिक्पालों की
और अग्नि की और पवन की शपथ उठाकर कहता है
क्षमा करो, क्षमा करो

अपने धंधे और मुनाफ़े के लिए
मैंने भर दी धरती की पीठ
रक्त छलछलाती खरोंचों से
यहूदियों को भेजा गैस चेम्बर में
काले को गोरों से, ग़रीब को अमीरों से
अलग-अलग रखने को खड़ी की दीवारें
गिराए परमाणु-बम
समुदायों को, नदियों को, मछलियों को
जंगली फूलों को, लताओं को, सितारों की चमक को
राख कर डाला
अपने असन्तोष की आग में
क्षमा करो
मेरी अनन्त क्रूरताओं को क्षमा करो

लेकिन तुम कहते हो-
कोई सफ़ाई नहीं माँगती है धरती
वह न्याय माँगती है न्याय
और देखना चाहती है कि भुगती जाय सज़ा
कोई भी पछतावा नही भर सकता है उसके ज़ख़्म
नहीं लौटा सकता है शान्ति
बचे हुओं के वास्ते
तो लो,
मै सौंपता हूँ अपनी गर्दन
तुम्हारी कुल्हाड़ी की धार को।


अनुवाद : राजेन्द्र शर्मा