भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

न पुराना दूँगा, न नया लूँगा / कुमार विमलेन्दु सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुम्हारा छल तुम्हें बता दूँ अगर
और यह भी कह दूँ कि जान गया था मैं, पहले ही
तुम्हें दुख होगा संभवत:

तुम पहले क्या करोगे?
अपने कृत्यों के औचित्य के पक्ष में, तर्क दोगे
या थोड़ा समय माँगोगे?
यह सोचकर कि थोड़ा समय बीतने पर
कुछ याद नहीं रहेगा मुझे

मेरा, तुम्हें समझ लेना
क्या इतना अनुचित है?
मैं सहूँ चुपचाप
क्या यही प्रत्याशित है?
यह मान लिया है तुमने कि
जब-जब कहोगे तुम
मैं आ ही जाऊँगा
स्वयं सम्हाल लूँगा सब समस्याएँ अपनी
और तुम्हें नहीं बुलाऊँगा

लेकिन ये जान नहीं पाए तुम कि
कई बार मेरा कुछ नहीं समझ पाना
तुम्हारे उत्साह के लिए होता था
और बहुत बार मेरा चुप रह जाना
सम्बंधों के निर्वाह के लिए होता था
संभ्रांत हो चुके हो अब तुम
तुम्हारे छल सकने की क्षमता
वह भी बिना ग्लानि के
प्रतिभा कहलाती हैं
तुम्हारे नए समाज में

नया तो सबके साथ हो सकता है
और होता भी है
मैंने भी कुछ नए नियम बनाए है
और बहुत कुछ अपना पुराना भी बचा लाया हूँ

मुझे खेद है
क्योंकि मुझे पता है कि
जब तुम यही पुराना
जो मैं बचा लाया हूँ
माँगने आओगे
और देना चाहोगे
अपना सारा नया
मैं न पुराना दूँगा
न नया लूँगा