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न सोज़ आह में मिरी, न साज़ है दिल में / सरवर आलम राज 'सरवर'

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न सोज़ आह में मिरी, न साज़ है दिल में
मैं लाऊँ कौन सी सौग़ात[1] तेरी महफ़िल में ?

मैं आईना हूँ कि आईना-रू [2]नहीं मालूम
ये वक़्त आया है इस आशिक़ी की मंज़िल में

ख़ुदी कहूँ कि इसे बेख़ुदी बताओ तुम
मैं अपने आप चला आया कू-ए-क़ातिल में

हमारे ज़ब्त ने रख्खा भरम ख़ुदाई का
ज़बां पे आ ही गई थी जो बात थी दिल में

न अपने दिल की कहो तुम ,न दूसरों की सुनो
अजीब रंग यह देखा तुम्हारी महफ़िल में

हरम के हैं ये शनासा[3], न दैर से वाकि़फ़
रखा है क्या भला इन मुफ़्तियान-ए-कामिल[4] में?

यक़ीं गुमान में बदला ,गुमां अक़ीदे[5] में
हमें तो बस ये मिला तेरे ख़ाना-ए-गिल[6] में

फ़राज़-ए-इश्क़ ने इस मर्तबे को पहुँचाया
रहा न फ़र्क़ कोई राह और मंज़िल में

ख़रोश-ए-मौजा-ए-तूफ़ां ने लाख दावत दी
उलझ के रह गये लेकिन फ़रेब-ए-साहिल में

अभी मिला भी न था हसरतों से छुटकारा
उम्मीद डाल गई आ के और मुश्किल में

कोई मुझे ’सरवर’ ! कहे न दीवाना
शुमार मुझको करो आशिक़ान-ए-कामिल[7] में !

शब्दार्थ
  1. उपहार
  2. आईना जैसा
  3. जाना-पहचाना
  4. पूरा मुफ़्ती
  5. श्रद्धा/विश्वास
  6. (मिट्टी का घर),ये दुनिया
  7. पूरा आशिक़