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पंचमी का चाँद / नरेन्द्र शर्मा

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आज चाँदी की कटारी की तरह
दीखता है पंचमी का चांद यह!
देख इसको कट सकेगी रात कुछ,
और भी--कट जायगा कुछ तो विरह!

विरह? किसका विरह? तेरा कौन है?
कौन है, कुछ तो बता, मन, कौन है?
विरह उसको, मिलन जिसको ईष्ट हो,
पर बता किस ध्यान में तू मौन है?

देख बादल--लगा रेवड़ खड़ी भेड़!
देख कैसे मौन साधे खडे पेड़!
देख तारे भी खिले दो चार जो,
उड़ वहाँ तू कल्पना को लगा एड़!

हॄदय मेरे! विरह की मत बात कर,
खूब खुश हो और हँस इस बात पर!
हम सितारों के इशारों पर चले,
आ, हँसें अब चाँद-तारे देखकर!

भाग्य निश्चित हो चुका तेरा, हृदय!
हँस; न कर इन तारकों से आज भय!
हम धरा पर पाँव अड़ा खड़े रहें
और मन को हो गगन लीला-निलय!