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पटाक्षेप / महेन्द्र भटनागर

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हो गयी शाम !

कोई नहीं आयगा,
भूल जाओ
सभी नाम !
हो गयी शाम !

मत करो रोशनी
अंधेरा भला है,
देख लूँ स्वप्न
हर बार जिसने
छला है !
विवश मूक मन में
पला है !

नहीं शेष
कोई काम !
हो गयी शाम !
सो लूँ
सरे-शाम,
अविराम!
आयाम.....
आयाम!