कत्तेॅ लंबा पतझर के दिन?
बुतरू भेलै जुआन, जुआनी झनकी गेलै बुढ़ाय;
सपना भेलै सपनोॅ कत्तेॅ आस गेलै मरुवाय;
गाँव-गाँव घर-गल्ली-कोन्टोॅ काटै हाय-निसास;
तबलोॅ चड़िया में चिनकी केॅ छायाहीन उदास!
कबेॅ पलभतै ठार उतरतै छाहुर पल-दिन?
बोलै छेलै ‘चच्चा’ होतै हरियर सौंसे देश
सब आँखी के लोर सुखैतै मिटतै सभे कलेश
शहर-मुहल्ला खुल्लम-खुल्ला छै पछिया के जोर
एक अन्हार सभै आँखी में मारै अजब हिलोर
कबेॅ पलटतै रोज, नङटाहा बनतै किरपिन?