परम पवित्र धार ताज शिव शंभु के जे
ओकरा में रूपसी नहावै मली देहु केॅ
रूप के छटा जे सब ओर छिटकाबै
ताप रूप के सम्हार हुवेॅ पारेॅ नहीं मेहु केॅ
अंग-अंग उमकि अनंग उपजाबै यहाँ
सहज बिसारै कवि सुध बुध गेहु केॅ
विधि केॅ सराहौ या सराहौ कामिनी के रूप
देखी उमताबै कवि रूपसी के मेहु केॅ॥