भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

परावर्तन / राधावल्लभ त्रिपाठी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

KKCatSanskritRachna

साँझ के समय
भौंक रहे हैं कुत्ते गली में मिलकर
आधी रात के सन्नाटे में
सियार करते हैं हुआँ हुआँ
लौट कर आते हैं पहले किए हुए पाप
भीतर ही भीतर गँसते हैं, धँसते हैं

जो दिन बीत चुका था
और जिसे दफ़ना आए थे मन के मसान में
वह अचानक उठ खड़ा होता है
जैसे सपना टूटने पर आदमी

वह अचानक भीतर की कोई खिड़की खोलकर झाँकता है
और लगाता है ज़ोर से पुकार-- यह आ गया मैं!