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परिधि / बद्रीप्रसाद बढू

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म जे जे होस् भन्थें उही उही यहाँ उल्टिन गयो
हरायो जे खोज्थें परिधि पनि यो छोटिन गयो
गयो खोला खोलै रहर मनको जिन्दगी भरि
रह्यो बाँकी धोको हृदय बिचरो रुन्छ यसरी //