भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पर्यावरण रा दूहा / लक्ष्मीनारायण रंगा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

प्रदूशण नै रोकणो, सै सूं पैलो काम।
जे काबू ओ नीं हुयो, बचा नीं सके राम।।

रंग-बिरंगो जैर‘तो, रच रैयो पोलीथीन।
फैषन, सुविधा कारणै, जीवण मौत अधीन ।।

नई है सुद्ध खावणो, नीं है निरमल नीर।
आभै में विस घुल रयो, हवा जै‘र रा तीर।।

दिवलो एक बाट रो, जल सी आखी रात।
दियो जी चार बाट रो, बुझती आधी रात।।

इण धरा री सुदंरता, रंग-रूप-रस पाण।
जे प्रकशित मिटती गई, जगती हुसी मसाण।।

धरती सै री मात है, आभो है जी तात।
मा- जाया सा बिरछ है, मत कर इण सूं घात।

धुंआ पी-पी धुंआ हुया, तन धुंएं री लकीर ।
तन-मन धन धुंआ लगा, हुयग्यो फकीर ।।

घायल धरा टसक रयी, हुयो गगन बीमार,
सागर रो दम धुट रयो, नदियां हाहाकार

सिवजी दाई जै‘र पी, इमरत बाँटे रूख।
कामधेनु अे कलपतरू, मत काटो थे रूख।।

जांभा जी सूं सीख लो, खेजडली री आण।
हरा रूंख जे काट सो, हुय सी देस मसाण।।

धरती मा रो दूध पी, बधै ए हरिया रूंख।
मा-जाया नै बाढ थे, बालो मा री कूख।।

इकीसवीं मे रैवणिया, सुणो सदी रो ग्यान।
आज लगाओं बन हरा, भविय मिलै बरदान।।

गगन-पवन, जल अर धरा, बणिया जै‘री दंस।
मिनख जमीं जलमा रया, धश्तराश्ट्री बंस।।

जठै-जठै आदम गयो, मैल बिखरी जाण।
गंग, हिमालो, चांद ई, मैला मिनखा पाण।।

नीं मेला, ना मगरिया, नई तीज-त्योहार।
सावण नीं, फागण नई, किंया करै सिणगार।।

भोर कुंकमिया नई, केसरिया नीं सांझ।
मोती सा दिनडा कठै, नीं चांदणिया रात