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पलटनिया पिता-2 / अनिल कार्की

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काले रंग का तमलेट
सिलवर का टिप्पन
‘चहा’ पीने वाला सफ़ेद कप्फू
एक हरिए रंग की डांगरी
बगस के किनारे
सफ़ेद अक्षर में लिखे
नाम थे
पलटनिया पिता

बगस के भीतर रखे उस्तरे
ब्लेड, फिटकरी का गोला
सुई, सलाई,
राईफ़ल को साफ़ करने वाला
फुलतरा और तेल
कालाजादू बिखेरते फौजी कम्मबल
हुस्की, ब्राण्डी, और रम की
करामाती बोतल थे
पलटनिया पिता

धार पर से ढलकती साँझ
पानी के नौलों (चश्मों) में चलकते सूरज
चितकबरे खोल में लिपटे
ट्राँजिस्टर पर बजते
नजीबाबाद आकाशवाणी थे
पलटनिया पिता

पलटनिया पिता के
खाने के दाँत और थे
और दिखाने के दाँत और
देशभक्ति उनके लिए
कभी महीने भर की पगार
कभी देश का नमक
कभी गीता पे हाथ रख के खाई क़सम परेट थी

कभी दूर जगंलों में राह तकती
घास काटती ईजा (माँ)
कभी बच्चों के कपड़े लत्ते जैसी थी
आयुर्वेदिक थी देश भक्ति
च्यवनप्रास के डब्बे-सी
आधुनिक थी देशभक्ति
मैगी के मसाले-सी
लाईबाय साबुन की तरह
जहाँ भी हो
तन्दुरुस्ती का दावा करती-सी

इसके अलावा वो हमें मिले थे
कई बार
कई-कई बार
मसलन
फ़िल्मों में
और तारीख़ों में
पन्द्रह अगस्त की तरह
छब्बीस जनवरी की तरह
कुहरीले राजपथों में
जोशीले युद्धों में
पंक्तियों में
कतारबद्ध चलते हुए
हाँके जाते हुए।