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पस-ए-निगाह कोई लौ भड़कती रहती है / सालिम सलीम

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पस-ए-निगाह कोई लौ भड़कती रहती है
ये रात मेरे बदन पर सरकती रहती है

मैं आप अपने अंधेरों में बैठ जाता हूँ
फिर इस के बाद कोई शय चमकती रहती है

नदी ने पाँव छुए थे किसी के उस के बाद
ये मौज-ए-तुंद फ़क़त सर पटकती रहती है

मैं अपने पैकर-ए-ख़ाकी में हूँ मगर मिरी रूह
कहाँ कहाँ मिरी ख़ातिर भटकती रहती है

दरख़्त-ए-दिल पे हुई थी कभी वो बारिश-ए-लम्स
ये शाख़-ए-जख़्म हर इक पल महकती रहती है