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पहाड़ी-पथिक अब शेष नहीं / कविता भट्ट


तुम खोए रहे व्यापार में
हम उलझे रहे निज हार में
उस कोंपल को क्या आशा
जो झुलसाई गई बहार में

सब व्यस्त यहाँ उपहार में
मन रमता नहीं उद्गार में
पहाड़ी-पथिक अब शेष
नहीं जीवन बीता पल चार में

पवन चल रही मरु-थार में
झरने-नदियाँ बिके बाज़ार में
निर्ममता से हिमखंड ऐसे गले
ज्यों घी गल जाए अंगार में

तुम भी डूबे व्यभिचार में
हम खोए वृथा प्रचार में
ओ पहाड़ से नीचे बहने वालो!
क्या पाओगे दूषित संसार में 