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पहाड़ी के पीछे / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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पहाड़ी के पार
क्यों नहीं दिख पाता
कुछ भी?
दिखता था कल तक
सबकुछ...
मन्दिर में चहल-पहल
हर रोज़..
तो कभी
श्मशान की भीड़

अरे....अरे....
तोड़ लिए किसी ने
सितारे भी अभी-अभी
और...
यह किसने रोक दिया
हवा को?
अब तो…
आवाज़ें भी बन्द हो गई हैं

पहाड़ी के पीछे से !

मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत