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पहाड़ी गीत / अनिल कार्की

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मन होता है कि
कह दूँ पहाड़ स्त्री का है
दुःख का पहाड़
बोझ का पहाड़
पहचान का पहाड़

लेकिन नहीं
इसे इस तरह कहना
उन पहाड़ी स्त्रियों को चुभेगा
जिनमें मेरी इजा[1] भी शामिल है
जो हर रात रोती है
और पहाड़ों की छाया उस पर किसी भयानक
आदमी की तरह पड़ती है

हालाँकि भ्यासपन[2] में ही छिपा है उसका सौन्दर्य
जो बोलता नहीं
दिखता है
भरता नहीं
रिसता है
टपकता है
अपने एकान्त में
किसी जंगली शहद-सा

जबकि उसका चीख़ना भी
एक गीत की तरह बसा रहता है
रकत बनकर हृदय की गहनता के भीतर
वह गहन से गहनतम होती जाती है

एक दिन एक बूढ़ी स्त्री
वैद्य बन जाती है
एक दिन वह स्त्री जान जाती है
आखिर फूल-पत्ती और घास-फूस
का मरहम लगाया जाता है किस तरह से
दुखती पीठ, चड़कती नसों पर

एक दिन उम्र के किसी उलार उतरते
वह थक जाती है
जीवन की अनगिन ऊँचाइयों से
एक दिन वह
सुनसान किसी जगह पर
टेक देती है अपनी पीठ
एक टक हिमालय पर पड़ती
सूरज की किरणों को देखती हुई

उसी समय
कहीं दूर से
प्रवासी पक्षियों के झुण्ड
मीलों लम्बी यात्रा पार करते हुए
कतारों में उड़ते हुए
पहुँच चुके होते हैं
पहाड़ी के ठीक ऊपर

शब्दार्थ
  1. माँ
  2. सहजता (भावार्थ)