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पहाड़ तरें ऊँट / आभा पूर्वे

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पढ़वोॅ-सुनवोॅ नै जाय वृथा
सुनोॅ, सुनैयों एक कथा
लाख बरस से भी ऊपर
एक मनुख छेलै भू पर
नाम मुरारी लाल छेलै
सुख-सम्पत रोॅ बीच खेलै
मतरकि ऐलै ऊ दुर्दिन
समय बनी गेलै बाघिन
एकेक करी केॅ गेलै धोॅन
लगै मुरारी केॅ नै मोॅन
सोचै धोॅन कमावै के
रस्ता एकरोॅ पावै के
सूझै मतर नै कोय उपाय
घोर निराशा आगू छाय
आखिर में सोचलकै ई
”बेची दियै ऊ कैहिने नी
पुरखा केरोॅ तराजू केॅ
मजगुत करियै बाजू केॅ
बिकला सें जे ऐतै धोॅन
व्यापारोॅ में देवै मोॅन“
ई सोची केॅ तराजू लै
यमुना दास लुगां गेलै
यमुना दास जे बड़का सेठ
ढंग होने जों बड़का पेट
गिरवी रखी तराजू केॅ
चललै दूर नगर आवेॅ
जाय वक्ती बोललै-”ऐवौं
टाका दै ई लै जैवौ।“
आखिर जाय विदेशोॅ में
व्यापारी के भेषोॅ में
धन अरजलकै अपरम्पार
याद ऐलै तबेॅ घोॅर द्वार
घर लौटी केॅ आवी गेलै
सेठोॅ लुग पहलें ऊ गेलै
माँगलकै आपनोॅ सामान
गिरवी राखलोॅ कुल के मान
पर सेठोॅ रोॅ नीयते खोट
ग्लानि केरोॅ बनैलेॅ ओट
बोललै- ”दुख छै हमरा घोर
तोरोॅ तराजू सम्पतखोर
मूसोॅ खाय गेलौं अफसोस
मूसोॅ पर छै हमरौ रोष
लेकिन की करियै बोलोॅ
भले केन्हौं हमरा तौलोॅ।“
कुछ सोची के मुरारी लाल
बोललै-”सेठ जी व्यर्थ मलाल
गेलोॅ चीज लेॅ रोना की
लौटतै नै, पछताना की
हमरा वै लेॅ फिकरो नै
करवौं आय सें जिकरो नै
पर अतना सहयोग करोॅ
पास में है सम्पत हमरोॅ
तोरोॅ पूत जों कुछ देरी
जोगी दै-लौं जल फेरी
नद्दी जरा नहैला सेॅ

परदेशोॅ रोॅ दोष भसेॅ
जरिये देर में छोड़ी देवै
वक्त बहुत नै ओकरो लेवै।“
सेठ मुरारी बात सुनी
सुख सें लेलकै आँख मुनी
फेनू बोललै- ‘यैमें की
हमरोॅ बेटा तोहरो नी
लै जा यै में की संकोच
आपना में की जरियो सोच।“
वैश्य मुरारी लाल ले लेॅ
चललै सुत के। घाट होलेॅ
आवी एक सुरंगोॅ में
बांधी रस्सी अंगोॅ में
राखी देलकै ओकरा जाय
आपनें लौटलै नदी नहाय।

सुत नै देखी साथोॅ में
झटका लागलै माथोॅ में
बोललै सेठ सशंकित होय
भीतर-भीतर कंपित होय
सेठोॅ के सब बात सुनी
लेलकै माथोॅ वहूँ धुनी
बोललै- ”की करियौ हे सेठ
बाजोॅ के हौ एक चपेट
लैउड़लै जे तोरोॅ लाल
काम नै ऐलै एक्को जाल
एकरोॅ हमरा बड़ा मलाल
काम नै ऐलै एक्को जाल।“

ई सब बात सुनी केॅ सेठ
रही-रही क्रोध सें कस्सै फेंट
गुस्सा सें भीतर तक जली केॅ
आरो वै गुस्सै में चली केॅ
राजा रोॅ दरबार पहुँचलै
जहाँ मुरारियो लाल ऐलै
सिंहासन पर राजा बैठलै
आरो मंत्रीगण भी जुटलै
हुकुम सुनी केॅ बोललै सेठ
”हमरोॅ श्यामलाल सुत जेठ
लै गेलै यै मुरारी लाल
आबे एकरोॅ दूसरोॅ चाल
बोलै छै-लै बाज गेलै

की सफेद नै झूठ भेलै
न्याय करोॅ तोहीं राजा
दुखिरत एक तोरोॅ प्रजा
जेहने भेलै बात खतप
राजा करलेॅ मूँ तम-तम
बोललै- ”कहैं मुरारीलाल
ई केन्होॅ तोरोॅ छौ चाल?“
हुकुम सुनी केॅ राजा रोॅ
नै बोलेॅ हिम्मत केकरोॅ
बोललै सब ठो कथा पुराण
गिरवी सें लै केॅ असनान
आरो सबटा कथा कही
बोललै- ”न्याय जों सही-सही

तेॅ हमरा समझावोॅ ई
एक तुला लोहा रोॅ की
मूसें खावेॅ पारै छै
की है सभां विचारै छै
जो शक्ति है मूसोॅ केॅ
एक तराजू लोहा केॅ
खावेॅ पारै छै बोलोॅ
जे कि आय तक नै होलोॅ
तेॅ की अचरज यै में आज
जो लड़का लै गेलै बाज
जों मूसोॅ लोहा केॅ खाय
केना ना बाज मनुख लै जाय?“
सेठ बैश्य रोॅ बात सुनी

बोललै राजा, सभा गुनी
”धूर्त सेठ केॅ चाहियोॅ कि
दियेॅ तराजू तुरत अभी
न्यायोॅ पर जे चूना पोतै
ऊ तेॅ दण्ड के भागी होतै“
एतना कही सभा कै भंग
राजा गेलै मंत्री संग।