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पहाड़ बिफर गया / ओम पुरोहित ‘कागद’

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ऊपर उठे-तने
पहाड़ोँ के शिखर
छू कर क्या बोली हवा
पूछने झुका दरख्त
... चरमरा कर टूट गया
अंग अंग बर्फ रमा
बैठा मौन साधक
साक्षात शिव सरीखा
कई कई नदियोँ से
अभिषेक पा कर भी
पहाड़ नहीँ बोला
बोला तो तब भी नहीँ
जब तूफानोँ ने झकझोरा !
पहाड़ उस दिन
बोला और सरक गया
जब उसके भीतर
कुछ दरक गया
अंतस की अकुलाहट
लावा दर्द घुटन का
बिखर गया
दूर जंगल मेँ
मौन पहाड़ बिफर गया ।