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पहिला सपना देखली देबकी, राति पहिले पहर हे / अंगिका लोकगीत

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

कंस द्वारा उत्पीड़ित देवकी रात्रि के पहले पहर आँगन में आम और इमली के पेड़ लग जाने, दूसरे पहर आँगन में हरे बाँस का बीट लगने, तीसरे पहर चमेली का फूल खिलने, चौथे पहर दरवाजे पर दही और छाँछ रख जाने तथा पाँचवे पहर पलँग पर श्यामवर्ण बालक के खेलने का स्वप्न देखती है। उसकी सास इस स्वप्न का समाचार सुनकर देवकी को चुप रहने का संकेत करती है, क्योंकि उसे भय है कि कंस अगर सुनेगा, तो कलेजे में छुरी घुसेड़कर बालक को मार डालेगा। वह उसे कहीं छिपा आने का संकल्प करती है।
यहाँ आम, इमली का पेड़, हरे बाँस का बीट, चमेली का फूल, छाँछ और दही का स्वप्न अच्छी वस्तु की प्राप्ति का द्योतक है। महापुरुषों के अवतार के पूर्व उनकी माताओं को स्वप्न-दर्शन का उल्लेख भारतीय परंपरा में होता आया है। इस गीत में वही परंपरा वर्णित है।

पहिला सपना देखली देबकी, राति पहिले पहर हे।
ललना रे, आम रे इमलिया के गाछ, अँगनमा बीच लागल हे॥1॥
दोसर सपना देखली देबकी, राति दोसर पहर हे।
ललना रे, हरिअर बाँस के बीट<ref>बाँस का एक समूह; एक जड़ से निकले हुए बाँसों का समूह</ref>, अँगनमा बीच लागल हे॥2॥
तीसर सपना देखली देबकी, राति तीसर पहर हे।
ललना रे, सुन्नर चमेली के फूल, अँगनमा बीच फूलल हे॥3॥
चौथा सपना देखली देबकी, राति चौथा पहर हे।
ललना रे, सुन्नर दही औरो छाँछ, देहरिया बीच धैल हे॥4॥
पाँचवे सपना देखली देबकी, भोर पाँचवे पहर हे।
ललना रे, सेयाम बरन के होरिलबा, पलँगिया बीच खेलै हे॥5॥
मँचिया बैठली तोहें सासू, कि सासू सुन मोर बात हे।
ललना रे, सेयाम बरन के होरिलबा, पलँगिया बीच खेलै हे॥6॥
चुप रहू, चुप रहू पुतहू, कि मोरी दुलरैति पुतहू हे।
ललना रे, सुनि पैतै<ref>सुन पायगा</ref> कंस दुसमनमा, करेजा छूरी मारतै हे॥7॥
देबै छिपाय होरिलबा, कि कंस न जानतै हे।
ललना रे, सेयाम बरन के होरिलबा, पलँगिया बीच खेलै हे॥8॥

शब्दार्थ
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