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पहिल खण्‍ड / भाग 1 / बैजू मिश्र 'देहाती'

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राज्य आयोध्या छल सुख धाम,
ततय छला नृप दशरथ नाम।
सूर्य वंश केर ध्रुव नक्षत्र,
यश सुरभित त्रिभुवन सर्वत्र।
पालथि प्रजा पुत्र सम जानि,
प्रजो चलय पितु बत हुनि मानि।
सभकें देथि न्याय भरिपुर,
कलह सतत् भागल छल दूर।
सभकें सभ सौं अतिसय प्रेम,
साधक सभ क्यो सभहक क्षेम।
मधुमय सबहक मुँह केर बोल,
कटुता कतहुने राखय मोल।
सत्पथ चलब सभक छल कर्म,
अनुचित तजब नियम छल धर्मं
ऋतु सभ आबथि करथि प्रभाव,
जेहन जेकर छल अपन स्वभाव।
असमय धरएने ककरो काल,
युव-युवती अथवा हो बाल।
धान्य धनक नहि कतहु अभाव,
कतहुने दुख दारिद्रय प्रभाव।
नहि छल रोग शोक केर नाम,
सुख सुगंध बह आठो याम।
सुमतिक शुभ फल एतए देखाए,
स्वर्गहुँ वैभव देखि लजाए।
नृपकें पुत्र रत्न छल चरि,
अनुपम छवि अतुलित बल धारि।
राम, लखन, श्री भरथ कुमार,
शत्रुघन सभगुण आगार।
नृपकें रानी छलथिन तीन,
सभगुणज्ञ सभ नीति प्रवीण।
कौशल्या, कैकेयी नाम,
तेसर सुमित्रा शुभगुण धाम।
कौशिल्या अवतारल राम,
कैकेयी सुत भरथ सुनामं
लखन, शत्रुहन धैलनि देह,
रानि सुमित्रा केर शुभगेह।