भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पहिल खण्‍ड / भाग 4 / बैजू मिश्र 'देहाती'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

से श्री राम युद्ध बिच जाए,
लड़ता बहुविधि कष्ट उठाए।
शंका नृप उर उठल अनेक,
पुत्र मोह बस तजल विवेक।
सजल नयन बजला अबधेश,
राम छोड़ि अर्पित अछि शेष।
बिना राम नहि रहता प्राण,
विधि दोसर नहि पओता त्राण।
स्वयं चलब हम सैन्यक संग,
हनव शत्रु जनु कीट पतंग।
हमर सैन्य केर शक्ति अपार,
सहिने सकल क्यो एकर प्रहार।

सुनितहि विश्वामित्र ऋषि, नृपकेर वहकल बात।
ठाढ़ भए गेला क्रोधसँ, थरथर कपइत गात।
पहिने कहलहुँ राज्य केर, सब किछु अछि उत्सर्ग।
ई सब बहलल बात अछि, धर्म बिरत अपवर्ग।
भूखल नहि छी राज्य केर, चाही केवल राम।
वचन पूर्ण जौ नहि करब, मेटब सब धनधाम।
लेलनि कमण्डल हाथमे, जनहिन विश्वामित्र।
शापक हत उद्यत छला, भएगेल दृश्य विचित्र।
ततक्षण गुरू वशिष्ठ उठि, कयलनि निज आदेश।
राम जाए ऋषि संग तहँ, हरथु जनक सभ क्लेश।
गुरू आदेशक अग्रमे, नहि छल दोसर उपाए।
कुण्ठित भए नृप रहिगेला, उर बिच अश्रु वहाए।
लक्ष्मण उठि बजला ततए, हमहु करब प्रस्थान।
राम जतए लक्ष्मण तए, नहि होयत व्यवधान।

ऋषिक संग चलता श्रीराम,
लखन सहित सिद्धाश्रम धाम।
बाटहिम लखि भूमि पवित्र,
बैसि गेला ऋषि विश्वामित्र।
रामचन्द्रकें निकट बजाए,
उपदेशल बहुविधि समझाए।
मानव धर्म नृपति केर-धर्म,
निर्वहनक अछि कीसभ कर्म।
तखन देल दिव्यास्त्रक ज्ञान,
मन्त्र सहित व्यवधान निदान।
सभ विधि भेला राम सम्पन्न,
जानि गुरूक उर अकथ प्रसन्न।
पुनि उठि चलला ऋषिकुल केतु,
सिद्धाश्रम पहुँचब छल हेतु।
आगाँ बन छल गहन कठोर,
दिन मणि सेहो गेला निशिकोर।
समय तारका असुर विहार,
करइत छल ऋषि संहार।
देखि ऋषि नर रामक संग,
लखन सहित कत अंग सुअंग।
देखि ताड़का भेलि प्रसन्न,
भक्ष्य भोज्य सभविधि सम्पन्न।
गरजल जनु घन साओन घोर,
काँपल विपिन बिकट चहुओर।
तखनहि ऋषि अनुशासल राम,
हनू दैत्य तजि क्षण विश्राम।
रामक कर छोड़लसे वाण,
पाबि ने सकल निसाचर त्राण।
धरणि खसल तनमन अकुलाए,
रूधिर बमन संग प्राण गमाए।
छल शरीर पर्वत आकार,
डोलि उठल महि बारम्बार।
ऋषि उर उपजल अति सएँ हर्ष,
हनल राम रिपु छल दुर्द्धष।
समाचार सुनि, खल उदंड,
हनल राम करलए कोदंड।
सहस-सहस ऋषि कुलक समाज,
अएला उर धए हर्षक राज।
ऋषि सभकें कहल बुझाए,
जेहि विधि मरल शत्रु अकुलाए।
सभ मिलि कएलनि जय-जयकार,
ऋषि, राम, श्रीलखन कुमार।
मेटि दनुज केर सभटा दम्भ,
ऋषिवर कएल यज्ञ प्रारम्भ।
बहुत दिवससँ छलजे बंद,
सहयोगल ऋषिगण सानंद।
राम लखनकें रक्षा भार,
भेला वाण धनु लए तैयार।
यज्ञ धूम छूलक आकाश,
दनुज अकानल आश्रम त्रास।
सबहक उर उपजल बहु क्रोध,
चलल कराबए दण्डक बोध।
तराक असुरक सुत मारीच,
बढ़त यज्ञ ध्वंसक हित नीच।
पाछाँ पाछाँ चलल सुबाहु,
छल स्वरूप धरती केर राहु।
दूहूकें छल बलक घमंड,
छल बल करए सतत् उदंड।
मद्य पीबि छल बनल कराल,
क्रुद्ध नयन कर्जनि सन लाल।
गरजल रिपुदल कठिन कठोर,
जलदक घनरब जनु हो घोर।
राम खलक मनसा अनुमानि,
छोड़ल वाण धनुषकें तानि।
तारक सुत कतगेल बिलाए,
वाण सहित नहि कतहु देखाए।
राम चलाओल दोसर बाण,
बांचिने सकल सुबाहुक प्राण।
खसल दैत्य धरणीकेर भार,
मुँह सौं खसल रूधिर केर धार।
बाँचल रिपु दल गेल पराए,
सिंह देखि जनु मृग द्रुत जाए।
खसए पड़ए छल ततेक सशंक,
चोरक उर जनु भीत भयंक।
यज्ञ भेल सभ विधि सम्पन्न,
ऋषिगण अति सैं भेला प्रसन्न।
राम, लखनकें देल आशीष,
यश सुरभित हो हे अवधीश।