पाँव पूजते थे कल तक जो / नईम

पाँव पूजते थे कल तक जो-
वही आज पूजेंगे माथे,

रोक न पाएँगे गोबर को
बूढ़ सयाने होरी माते।

आदमख़ोर शिकारी के दिनमान लद गए।
घायल सिंह, सूकरों के भी पाँव सध गए;

फटे दूध-से बिगड़ गए
मनसाई के ये सारे लाते।

सूरज के रथ में कब तक ये जुते रहेंगे?
राख धूल से चेहरे कब तक पुते रहेंगे?

नाथ लिया जी-भर पशुओं-सा,
और न कोई इनको नाथे।

मुझे वर्ग से पहले आशंका वर्णों की,
धर्मराज बारी आई है अब कर्णों की;

स्वर्णछत्र के रहते बागी
हो जाएँगे लाठी-छाते।

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