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पांती / श्याम महर्षि

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न्यारा निरवाळा हुया
जणा पांती करीजी भींता री
आळां री-मोरयां री
हट्ड़या री कै करीजी पोळ्यां री,

जद न्यारा हुया
बांटीज्या सिल-लोढ़ा
कै माच्चा कै सोड्-पथरणा,

कै पांती करीजी
थाळी लोटा
अर बाटकी-तपेल्यां री,

निवड़ै पुन्याई
आपस मांय बाखळां घूमर घालै सुवारथ
भीखै रा दिन
बावड़-बावड़ आवै।

पांती सूं पैली रो
महाभारत
कुणकित्तो कमावै
तो कुण खावै बतो
कै कुण कारज करै बत्तो
कै कुण न्हाखै घी शक्कर थाळ्या मांय
इण सोच माथै
जी मिचळावै अर माथै मांय जुळबुळाबै कीड़या