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पागल मन / राजेश गोयल

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बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है।
जब-जब तेरा रूप निहारूं, मन कैसर सा हो जाता है॥
फूलांे सी मुझको तुम भाती,
घड़ियाँ वो मिलने की मधुरम।
मधुमति सी महक तुम्हारी,
मेरी साँसों की तुम घड़कन॥
नेनों ने तुमको जो देखा, मन चंचल सा हो जाता है।
बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है॥
मन में अन्दर की हलचल
मोहक तुम मुझको लगती हो।
अंग - अंग तरूणाई लेता,
तुम पुरबा वायु लगती हो॥
दर्पण में तुमने जो देखा, मन सम्मोहित हो जाता है।
बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है॥
महावर पांव में संचित,
लिख रही किस्मत की रेखा
देखती तुम कनखियों से
नयन में काजल की रेखा॥
देख तुम्हारा रूप मनोरम, मन सरसों सा हो जाता है।
बोल सुहाना सुनकर तेरा, मन पागल सा हो जाता है॥